Sunday, 21 August 2011

adhoore se.....

तेरी हर ख़ामोशी ,
दिल को यूँ सहमा जाती है,
दूर होकर मुझसे तू ,
दिल को तड़पा क्यों जाती है,
तुझको एहसास ही नहीं इस दर्द का,
फिर क्यों अपना बेताब सा चेहरा
अधूरी सी मुस्कान लिए ,
मेरे ख्वाबों में चली आती है.


जवाब दे मेरे इन सवालो का,
की इन्हें भी तेरी सिसकियाँ छुपा ले जाती है,
लगे न लगे तुझे पर ,
अब गोलगप्पों से भरी हर शाम,
अधूरी ही रह जाती है.


बैठी है तू अभी मेरी पलकों पर ,
यकीन कर ले मेरे इन लफ्जों पर,
या देख ले मेरी आखों से बह कर ,
हर ज़र्रा अब अपनी हद तलाशता ,
तो क्यों मेरी हदों में तू नहीं आता .