Khoya gaya kahin.....??
कितनी पास थी वो मेरे ,
मेरी पलकों के सहारे,
बैठी थी कुछ शरमा के,
शोर भी था उसकी ख़ामोशी में,

गुजरी हवा जब मेरे पास से,
लगा होठों को चूमा हो उसने,
वो आबो हवा लगी मझे अपनी सी,
शायद छूकर आई थी उसकी सासों को,

उसकी दुनिया थी चाँद के पार,
भीगे आसमान के सिराहने,
सुबह के रोशन तालाब से,
निकलती थी वो परदा करके,

गुलाबी से होंठ,काले नैना,
भीगी थी जुल्फें,मचला सा मन,
उसका खुदा भी बड़ा हसीं होगा,
गुम था कही मैं,खो गया मैं उसके ख्यालों में,

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