ना सोचा ना समझा, बस चला उन राहों पर ,
आज खड़ा हूँ, अंजाने से दोराहों पर,
अब सोचता हूँ चलूँ किस ओर,
जो मिल जाये मंजिल का निशाँ,
फिर देखता हूँ , ये मंजिलें, ये राहें ले जाएँगी कहाँ?
क्या पा सकूँगा वो जो पाने निकला था,
लगता है अभी दूर हूँ शिखर से, मन तो यही कहता है,
इसीलिए जरुरत है एक साथी की ,
ये कहानी हैं उस जलते हुए दिये की बाती की,
वो तो आत्मा है उस दिये की,
पर सारा जहाँ भूल जाता है, समर्पण उस बाती का ,
शायद वही बाती बन गया हूँ मैं |
खुद से मैं यूहीं पूछता हूँ,
क्यों दूर है वो इतना की नज़र नहीं आता,
पास जो जाऊ तो पास नहीं आता ,
क्या डर है ये प्यार के एहसास का,
या डर है उसे इस पापी संसार का,
जितने भी मिले आज तक सब भूखे ही थे,
क्या विश्वास क्या निष्ठा उनके लिए शब्द अर्थहीन ही थे,
यही था वो डर जो पनप रहा था उसके मन में,
क्या कहेगी ये दुनिया इस रिश्ते को,
क्या अब कहूँ , मुश्किल में हूँ,
अब मिलेंगे अगर मिलना लिखा होगा.
शायद ये ख्वाब कभी पूरा होगा |
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